रागिब ककरालवी: उर्दू शायरी के सफ़र और अदबी विरासत की कहानी | Raghib Kakralavi: A Story of the Journey and Literary Legacy of Urdu Poetry

माहिरे फन उस्ताद शायर मोहतरम रागिब ककरालवी  के साथ असलम जावेद का एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार है।


रागिब ककरावी का साक्षात्कार: उर्दू साहित्य के एक महान शायर से मुलाकात 


प्रारंभिक परिचय


ये साक्षात्कार प्रसिद्ध उर्दू शायर रागिब ककरालवी के साथ असलम जावेद द्वारा लिया गया है। रागिब ककरालवी, लगभग 65 वर्षीय, उर्दू साहित्य में आप का विशेष योगदान हैं आप को अदब का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है ।


व्यक्तिगत जानकारी


वास्तविक नाम और तख़ल्लुस: रागिब ककरालवी का बचपन का नाम राग अली खान था । आप ने बताया कि प्राइमरी के दौर में उनके उस्ताद विसाल उद्दीन साहब की देखरेख में उन्होंने शुरुआती तालीम हासिल की । बाद में उन्होंने अपनी ही मर्जी से 'बहार' तख़ल्लुस रखा, लेकिन जब उन्हें पता चला कि तीन-चार शायर पहले से इस तख़ल्लुस का उपयोग कर रहे हैं, तो उन्होंने अपने नाम का ही तख़ल्लुस 'रागिब' चुना ।


जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि


रागिब साहब का जन्म 22 दिसंबर 1955 को ककराला में हुआ था । उनके परिवार में पांच भाई-बहन थे - तीन बहनें और दो भाई । वे सबसे छोटे थे । उनके बड़े भाई आफताब अहमद खान और साकिब अली खान थे, जो बीएसओ में क्लर्क थे ।


शैक्षणिक यात्रा


प्रारंभिक शिक्षा रागिब साहब की शैक्षणिक यात्रा काफी दिलचस्प रही है। आप ने बताया कि वे दो सिपारे हिफज़ कर पाए थे, लेकिन दुर्भाग्यवश एक दुर्घटना में उनका हाथ टूट गया । इस दुर्घटना के कारण सरकारी अस्पताल में हड्डी गलत तरीके से जुड़ गई, जिससे उनके हाथ में संवेदना समाप्त हो गई । बाद में अलीगढ़ में इसका उपचार कराया गया ।


उच्च शिक्षा


उन्होंने इंटर की परीक्षा इंग्लिश से पास की और उर्दू में डबल एमए भी किया । पहली बार में नंबर कम आने पर उन्होंने दुबारा एमए किया और इस बार बेहतर नंबर प्राप्त किए । इसके अलावा उन्होंने उर्दू कौमी काउंसिल से उर्दू और अरबी में सर्टिफिकेट भी हासिल किया ।


शायरी की शुरुआत



रागिब साहब ने 12 साल की उम्र में शायरी शुरू की थी । उनके मार्गदर्शक मुंतखाब अहमद खान नूर ककरालवी थे, जो एक खानकाही शख्सियत थे । उनका रिश्ता उस्ताद-शागिर्द से कहीं अधिक दोस्ताना था ।


पहली नात


उनकी पहली रचना एक नात शरीफ थी, जो मौलाना अहमद रजा खां बरेलवी के कलाम से प्रेरित थी। उस  में 'फूल' रदीफ थी, लेकिन उन्होंने इसे 'नूर' से बदला :


“लब नूर जुबां नूर बदन नूर कदम नूर

बेशक है सरापा मेरे सरकारे ए उम्म नूर” 


व्यक्तिगत जीवन


विवाह और संतान


रागिब साहब की शादी 1984 में 22 साल की उम्र में हुई थी । उनके पांच बच्चे हैं - दो बेटियां और तीन बेटे । दुर्भाग्यवश, उनकी बड़ी बेटी की कोरोना काल में मृत्यु हो गई थी । उनके बेटों के नाम खुशअख्तर, मुसर्रर और मुअत्तर हैं ।


दिल्ली प्रवास


एक समय रागिब साहब दिल्ली के सीलमपुर, कांतिनगर में रहते थे । उस समय वहां की स्थिति काफी कठिन थी - सड़कों की हालत खराब थी और बिजली के सीमेंटेड पोल लगे हुए थे । बाद में वे अपने गांव वापस चले गए और खेतीबाड़ी में लग गए ।


साहित्यिक योगदान और पहचान


उर्दू अकादमी की मान्यता


उर्दू अकादमी दिल्ली सरकार ने उनकी किताब 'तड़प' छापी है । उन्होंने इस किताब को दुबारा संपादित किया और कठिन शब्दों को आसान शब्दों से बदला ताकि आम लोग इसे आसानी से समझ सकें ।


मुशायरों में प्रतिष्ठा


रागिब साहब ने बताया कि उर्दू अकादमी के  नये पुराने चिराग मुशायरे तब तक पूरा नहीं होते जब तक वे अपना कलाम प्रस्तुत नहीं करते । उनके कलाम की एक खासियत ये है कि श्रोताओं को लगता है जैसे वे 1700 वी सदी के  शायरों का कलाम सुन रहे हों ।


महत्वपूर्ण अनुभव और मुलाकातें


इंदौर मुशायरा (1991)


नवंबर 1991 में इंदौर के रवींद्रनाथ गृह में एक ऑल इंडिया मुशायरा हुआ था । शुरू में आयोजकों ने उनका नाम शामिल नहीं किया लेकिन एक ही शेर सुनकर उन्हें मुख्य कार्यक्रम में शामिल किया गया, जब उन्होंने अपनी गजल सुनाई, तो वे इतने प्रभावित हुए कि अगले दिन के विशेष कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित किया ।


उनकी प्रसिद्ध गजल का मतला


“मैं एक ही नहीं आलम उदास रहता है

कोई बहुत तो कोई कम उदास रहता है”


अहमद फराज से मुलाकात


पाकिस्तान के कराची में जनवरी 1995 में नेशनल स्टेडियम में एक मुशायरा हुआ था । वहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध शायर अहमद फराज से हुई । फराज साहब ने उनकी डायरी पर एक शेर लिखा था:


“न मांग एक भी लम्हा खुशी का दुनिया से 

ये कर्ज़ वो है जिसे उम्र भर उतारेगा” रागिब साहब ने इस शेर में एक छोटी सी तबदीली की सिफारिश की और फराज साहब ने उसे सराहा ।


शागिर्दों और साहित्यिक संबंधों का वर्णन


मार्गदर्शन की पद्धति


रागिब साहब ने स्पष्ट किया कि वे किसी को औपचारिक रूप से शागिर्द नहीं बनाते, बल्कि मुशीर की हैसियत से जो सलाह मांगता है उसे मशवरा दे देते हैं । उनके कुछ उल्लेखनीय शागिर्दों में चांद ककरालवी, अफज़ाल देहलवी, असरार देहलवी, हयात नागोरी इरफान अंबरी, जफर कानपुरी और वसीम नादिर शामिल हैं ।


महिला शायराओं के साथ दूरी


उन्होंने बताया कि वे महिला शायराओं को सिखाने में दिलचस्पी नहीं रखते और दूर रहना ही बेहतर समझते हैं । उनका कहना है कि ये फितरत की बात है और वे इसमें अपनी खैरियत समझते हैं ।


तकनीकी सुधार की कला


शायरों की गलतियों का सुधार रागिब साहब के पास शायरों की गलतियों को पहचानने और सुधारने की विशेष योग्यता है। उन्होंने कई उदाहरण दिए जहां उन्होंने प्रसिद्ध शायरों के शेरों में सुधार की सलाह दी ।


इकबाल अशहर साहब का एक शेर था


“आप की ये बेरुखी किस काम की रह जाएगी

आ गया जिस रोज़ अपने दिल को समझाना मुझे”


रागिब साहब ने इसमें सुधार की सलाह दी:


“आप अपनी बेरुखी पर देखना पछताएंगे

आ गया जिस रोज़ अपने...”


इकबाल अशहर साहब ने इस सुधार को सराहा और स्वीकार किया।


शायरी की तकनीक पर सलाह


नए शायरों के लिए संदेश


रागिब साहब का नए शायरों के लिए मुख्य संदेश यह है कि खुशदिली से और पूरी दिलचस्पी के साथ हर फन सीखना चाहिए । उन्होंने कहा कि अगर हमने यह समझ लिया कि हमारी तालीम पूरी हो गई है, तो ये हमारी गिरावट की शुरुआत हो जाती है ।


सच्चे उस्ताद की कमी


उनका कहना है कि आजकल सच्चे जज्बे से सिखाने वाले उस्ताद कम हो गए हैं । दो-दो लाइनें पढ़कर ही लोग उस्ताद बनने लगते हैं । जब तक अहंकार की बीमारी नहीं जाएगी, तब तक कुछ नहीं होगा ।


मशवरे की महत्ता


उन्होंने बताया कि जब कोई उस्ताद नहीं मिलता तो वे “दरो दीवार से मशवरा करते हैं” और कोई न कोई बात निकल आती है । ये दिखाता है कि सच्चा शायर हमेशा सीखने के लिए तत्पर रहता है ।


अंतिम गजल प्रस्तुति


साक्षात्कार के अंत में रागिब साहब ने रम सीतापुरी की जमीन में एक खूबसूरत गजल पेश की 

”अपने जल्वों की हंसी बज़्म सजाकर मुझ में 

बैठ जाता है सरे शाम वो आकर मुझ में” 

यह गजल उनकी काव्य प्रतिभा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है ।


निष्कर्ष


यह साक्षात्कार रागिब ककरावी की जीवन यात्रा, उनके संघर्षों, उपलब्धियों और उर्दू अदब के प्रति उनकी निष्ठा का एक संपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करता है । उनके व्यक्तित्व से ये स्पष्ट होता है कि सच्चा शायर वही होता है जो जीवन भर सीखता रहे और अपने फन को निखारता रहे । उनका ये साक्षात्कार नए शायरों के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ का काम करता है।



By Aslam javed


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